उर्दू के बिना

रवि अरोड़ा

मेरे इर्दगिर्द के जवाँ होते बच्चों को पुराने हिंदी फ़िल्मी गाने बहुत भाते हैं । अक्सर वे मुझसे पूछ लेते हैं कि फ़लाँ शब्द का क्या अर्थ है अथवा इस शब्द को हिंदी में क्या कहते हैं । बच्चे बेचारे क्या करें ? पुराने सभी गाने उर्दू में ही होते थे और उर्दू ज़बान इस पीढ़ी को आकर्षित तो करती है मगर यह उसने कभी पढ़ी नहीं । लेकिन उर्दू तो कभी मेरे कोर्स में भी नहीं थी । फिर मुझे और मेरे साथ की पूरी पीढ़ी ने ये कहाँ से सीखी ? बेशक उर्दू लिपि हम लोगों से भी कोसों दूर थी मगर उर्दू के अधिकांश शब्द तो अपने पल्ले पड़ ही जाते थे । किसने सिखाई थी हमें यह मीठी जबान ? हमारे आस पास ने , बुज़ुर्गों ने , पुरानी हिंदी फ़िल्मों ने या इन तीनो ने मिलकर ? मगर अब क्या हुआ ? हमारा आसपास क्यों हिंदवी से ब्रितानवी हो गया ? रेख़्ता अचानक कहाँ गुम हो गई ? घरों में मिलाप , नई दुनिया और प्रताप जैसे उर्दू अख़बार आने बंद क्यों हो गए ? सबसे बढ़ कर हमारी फ़िल्मों से उर्दू क्यों रुख़सत हो गई ?

मेरी पूरी पीढ़ी का बचपन बारस्ता हिंदी फ़िल्में साहिर लुधियानवी , कैफी आज़मी , शकील बदायूँनी , हसरत जयपुरी , मजरूह सुल्तानपुरी और नक़्श लायलपुरी जैसे शायरों के गीत , ग़ज़लें और नज़्म सुनते हुए बीता है । पहले और बाद के के बड़े शायरों ग़ालिब , मीर , इक़बाल , फ़िराक़ और फ़ैज़ आदि के कलाम भी हम लोग बड़े शौक़ से सुनते थे । हालाँकि कई शब्दों पर हम लोग भी सिर खुजाते थे मगर फिर अंदाज़े से उसका अर्थ लगा ही लेते थे । कई बार जे हाल ए मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल अथवा हम हैं मताए कूचाओ बाज़ार की तरह जैसे गीतों पर अटक भी जाते थे मगर पूछपाछ कर काम चल ही जाता था । तलत महमूद , सुरैया और नूरजहाँ जैसे गायकों की आवाज़ आज तक कानों में गूँजती है । मुगले आज़म , पाकीज़ा और उमराव जान जैसी फ़िल्मों के गीत-ग़ज़लें अभी तक रटे हुए हैं । वैसे शायर तो आज भी एक से बढ़ कर एक कलाम कह रहे हैं मगर पता नहीं क्या हुआ कि आम आदमी के ज़ेहन में घर करने वाली फ़िल्मों में उनकी ग़ज़लें और गीत जगह नहीं बना पाते ? राहत इंदौरी , बशीर बद्र , वसीम बरेलवी और मुन्नवर राणा जैसों की शायरी का मैं क़ायल हूँ मगर फ़िल्मी दुनिया के दरवाज़े इनके लिए नहीं क्यों नहीं खुलते ? उर्दू के उस्ताद गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे शायर-गीतकार बेशक फ़िल्मी दुनिया में हैं मगर वे भी उर्दू से परहेज़ ही करते हैं । निदा फ़ाज़ली ने भी तमाम उम्र अपने फ़िल्मी गीतों को उर्दू से दूर रखा ।

यह तो हम सभी देख ही रहे हैं कि उर्दू अब समाज की भाषा नहीं रही । मगर कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि एक बड़ा वर्ग इसे मुस्लिम धर्म की भाषा समझ रहा है। कोई हमें बताता क्यों नहीं कि उर्दू इस्लाम की नहीं हिंदुस्तान की भाषा है । इस्लाम की भाषा तो अरबी है । बेशक उर्दू में अरबी और फ़ारसी के शब्द बहुतायत में हैं मगर इसमें संस्कृत और हिंदी के शब्द तो उनसे भी ज़्यादा हैं । कई विद्वान तो यह भी दावा करते हैं कि इसकी उत्पत्ति संस्कृत से ही हुई और प्रमाण में वे संस्कृत के तत्सम शब्दों का हवाला देते हैं । बेशक यह लिखी अरबी लिपि में जाती है मगर यह तो हमलावर मुस्लिम शासकों ने अपनी सहूलियत के किए किया । इसमें उर्दू ज़बान का क्या दख़ल । इसका व्याकरण तो विशुद्ध रूप से हिंदुस्तानी है और हिंदी से मेल खाता है । यह तो मिठास की ज़बान है और शायद तब भी बोली जाती थी जब इसे पहली बार लिपिबद्ध किया गया होगा । कोई भी भाषा लिखने से पहले बोली ही तो जाती है और यूँ भी उर्दू तो लिखे शब्द से कई गुना अधिक बोलचाल की ही भाषा है ।

मैं अदना सा इंसान कैसे हिमाक़त कर सकता हूँ कि किसी भाषा की विदाई की घोषणा करूँ । उर्दू जैसी जबान जो एक दर्जन से अधिक देशों में बोली जाती हो उसके बाबत तो यूँ भी एसी घोषणा नहीं की जा सकती मगर डर तो फिर भी लगता ही है कि कहीं एसे हालात में उर्दू ही हमसे ना रूठ जाए । आप ही बताइए उर्दू के बिना दिल की बात कहनी इतनी आसान होगी क्या ?

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