उभरते हुए शहर का बेड़ा गर्क

रवि अरोड़ा
वह भी क्या दौर था जब कोई शहर केवल इतने भर से ही मशहूर हो जाता था कि फलां फलां बड़ी शख्सियत वहां पैदा हुई है । वे बड़ी शख्सियतें भी अपने शहर को इतना महत्व देती थीं कि अपने नाम के साथ शहर का जिक्र भी लाज़मी होता था । कवि, शायर, गीतकार ही नहीं कला क्षेत्र के भी ऐसे दर्जनों नाम आपको याद होंगे, जिन्होंने अपने शहर को ही अपना उपनाम बना रखा था । साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, हसरत जयपुरी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे लोगों के कारण आज भी उनके शहरों को एक खास पहचान मिली हुई हैं। इतना ही नहीं फिल्मी गाने में एक शहर का नाम क्या आया कि उस शहर की शोहरत भी बुलंदियां छूने लगी। मैं बात कर रहा हूं  54 साल पहले आई फिल्म मेरा साया के गाने- झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में की। इस गाने से बरेली की शोहरत ऐसी हुई कि स्थानीय विकास प्राधिकरण ने इसका लाभ लेने को शहर में बड़े चौराहे पर एक बड़ा सा झुमका ही लगा दिया है और साथ ही इसे झुमका तिराहा नाम भी दे दिया गया है। मगर हाय रे मुल्क का दुर्भाग्य! अब लुच्चों, लफंगों, बदमाशों और खूंखार अपराधियों के कारण कुछ शहर जाने जा रहे हैं। कारण यह है कि अब इस किस्म के लोग भी अपने नाम के साथ उपनाम के तौर पर अपने शहर अथवा गांव का उल्लेख करने लगे हैं। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो यह चलन कुछ अधिक ही बढ़ चला है। उदाहरण है नूंह दंगे का मास्टर माइंड मोनू मानेसर। अब इस बदमाश के चक्कर में यह उभरता औद्यौगिक शहर अच्छा खासा बदनाम हो रहा है।

मानेसर शहर गुरुग्राम के निकट मुल्क में सबसे अधिक तेजी से विकसित होने वाला औद्योगिक शहर है। खेड़कीदौला टोल प्लाजा से पटौदी तक फैले मानेसर शहर में मारुति, होंडा, मित्सुबिशी, टोयोटा जैसे कई विश्वस्तरीय ब्रांड का बड़ा औद्योगिक उत्पादन हो रहा है। इन बड़ी इकाइयों के कारण सैकड़ों छोटी इकाइयां भी संचालित हो रही हैं। इनमें लगभग तीन लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं और वर्तमान में शहर की आबादी भी छह लाख तक पहुंच गई है। माना जा रहा था कि एनसीआर के सबसे विकसित शहरों में बहुत जल्दी मानेसर का नाम होगा मगर हाए रे ये लफंगा, जो इस शहर का नाम अपने से जोड़ कर इसे बदनाम कर रहा है।

गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में विभिन्न अखबारों का प्रमुख रहते हुए मैंने नजदीक से देखा है कि अपराधियों के कारनामों की कीमत उसके शहर को कितनी चुकानी पड़ती है। यहां भी दर्जनों ऐसे अपराधी हुए हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र को अपने उपनाम के चलते ही रुसवा करवाया । यहां आज भी ऐसे कई कुख्यात बदमाश हैं जिनके नाम के साथ उनके गांव अथवा कस्बे का नाम जुड़ने से वहां युवाओं की शादी ब्याह में अड़चनें आती हैं। इन्हीं चंद बदमाशों के कारण बाहर का व्यापारी यहां आना पसंद नहीं करता था और तमाम सहूलतों के बावजूद दशकों तक यह क्षेत्र कायदे से तरक्की भी नहीं कर सका । आलम यह भी रहा कि गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद से गुजरते हुए लोग अपनी कार भी भीतर से लॉक कर लेते थे । अफसोस ! यही खतरा अब मानेसर के सिर पर मंडराता दिख रहा है। सबको पता है कि मौनू मानेसर पर गौ हत्या के आरोप में दो लोगों को जिंदा जला देने का आरोप है। नूंह दंगे का मास्टर माइंड भी उसे ही माना जा रहा है। वह जिस तरह से हथियारों के साथ अपने वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, उससे वहां के काम धंधे वाले में अच्छा खासा खौफ है। बजरंग दल से जुड़े होने के कारण हरियाणा की सत्ता पर भी उसकी अच्छी खासी पकड़ है, जिसका फायदा वह अपनी धौंस बढ़ाने में करता है। सत्तारूढ़ नेताओं की मजबूरी सबकी समझ में आती है। सबको मालूम है कि साल भर के भीतर होने वाले हरियाणा विधान सभा और लोकसभा के चुनावों में मोनू मानेसर और बिट्टू बजरंगी जैसों की बड़ी भूमिका होनी है। इसलिए ही इनकी नकेल कसे जाने की कोई संभावना नहीं है । चलिए मत कसिये नकेल मगर कम से कम मोनू के नाम से मानेसर उपनाम तो हटवा दीजिए । उससे जो खुराफातें करवानी हैं, वे उसके असली नाम यानी मोहित यादव के द्वारा भी तो करवाई जा सकती हैं। क्यों खामखां एक उभरते हुए शहर मानेसर का बेड़ा गर्क करवाते हैं।

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