उत्पात के असली कारण

उत्पात के असली कारण
रवि अरोड़ा
‘ बोल बम बोल बम ‘ की गूंज आजकल हवाओं में है। कोई इसे धार्मिक अनुष्ठान की नजर से देख रहा है तो कोई कुछ कांवड़ियों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात की खबरों से कुपित है। हालांकि इस कांवड़ यात्रा को लेकर मेरा नजरिया भी सदा नकारात्मक ही रहा है मगर पता नहीं क्यों इस बार इन कांवड़ियों पर लेकर मुझे कतई गुस्सा नहीं आ रहा । मन में रह रह कर बस यही विचार आता है कि हमारे ये बेचारे युवा कांवड़ भी न लाएं तो और क्या करें ? करने धरने को और कुछ है नहीं और ले देकर साल में एक बार ही अभिव्यक्ति, साहस और स्टाइल दिखाने का अवसर मिलता है, तो उसे भी ऐसे कैसे जाने दें ? ऊपर से पूरी यात्रा के दौरान सरकारी दामाद होने का एहसास हो तो भला कोई कैसे चूके ? जब स्वागत में कई दिन पहले ही सड़कें खाली करा दी गई हों, ट्रकों को सड़क के किनारे खड़ा करवा दिया हो, स्कूल कॉलेज बंद करा दिए गए हों, कोई हादसा न हो, इसलिए बिजली के खंभों पर प्लास्टिक की पन्नियां बांध दी गई हों, जगह जगह खाने पीने के स्टॉल लगे हों, मार खाकर भी पुलिस वाले पैर दबा रहे हों और मुख्यमंत्री , मंत्री व अफसर पुष्प वर्षा कर रहे हों तो भला ऐसे में किसका मन नहीं मचलेगा , इस उत्सव में शरीक होने को ?
पूछा जा रहा है कि इस कांवड़ यात्रा में दलित और पिछड़ी जातियों के लड़कों को ही क्यों धकेला जा रहा है और क्यों कथित ऊंची जाति के लोग इसमें भाग नहीं लेते ? क्यों प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, अन्य मंत्री, संत्री, अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पढ़े लिखे लोग कांवड़ लेने नहीं जाते ? मेरी राय में इस किस्म के सवाल सामाजिक कम राजनीतिक अधिक हैं। ठीक वैसे ही जैसे यह कांवड़ यात्रा अब धार्मिक सांस्कृतिक कम राजनीतिक आयोजन अधिक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कथित छोटी और पिछड़ी जातियों के युवा इस यात्रा में अधिक शामिल होते हैं मगर इसका कारण यह भी तो है कि इन जातियों की संख्या भी तो देश की कुल आबादी की दो तिहाई है। सर्वाधिक फुर्सत में भी तो वही हैं। रहा सवाल कथित बड़े लोगों का तो भाई उन्हें कांवड़ लाने की क्या जरूरत है , उनका कौन सा काम रुक रहा है कांवड़ के बगैर ? वैसे जाति के अतिरिक्त इन कांवड़ यात्रियों की कोई और पहचान नहीं है क्या ? क्या यह भी जांचा परखा नहीं जाना चाहिए कि इनमें से कितने लोग बेरोजगार हैं और कितने काम धंधे वाले ? ये न्यूज चैनल और अखबार वाले कांवड़ यात्रा से जुड़े अन्य मुद्दों के साथ साथ रोज़गार के पहलू पर भी नजर क्यों नहीं दौड़ा रहे ? विश्व बैंक के अनुसार इस समय भारत में 15 से 24 साल की उम्र के 45 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। यही नहीं ग्रेजुएट बेरोजगारों की संख्या भी 42 परसेंट है। बेरोजगारों में 83 फीसदी शिक्षित हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के आंकड़े भी भारत में भयंकर बेरोजगारी की चुगली करती है। उधर, स्वयं भारत सरकार के आंकड़े भी सुनहरे नहीं हैं। इन्हीं आंकड़ों के अनुरूप नरेंद्र मोदी के ग्यारह साल के शासन में दावों के विपरीत बेरोजगारी कम नहीं हुई बल्कि बढ़ी है। साल 2014 में बेरोजगारी दर का सरकारी आंकड़ा 5. 44 फीसदी था जो 2024 में पकौड़े बेचने को भी रोजगार मानने के बावजूद 5. 6 पर्सेंट रहा । बेशक आंकड़े में बहुत अंतर दिखाई नहीं पड़ रहा हो मगर इन सालों में बढ़ी आबादी के हिसाब से देखें तो अंतर काफी बड़ा है। अब आप स्वयं ही अंदाजा लगाएं कि गांव देहात में खाली बैठा युवा यदि साल में एक बार कांवड़ यात्रा के बहाने अपनी हताशा , निराशा और कुंठा से बाहर आने का क्षणिक जतन करे तो उसे कैसे रोकें अथवा टोकें ? यूं भी कांवड़ यात्रा अब धार्मिक कम और एक सामाजिक और सामूहिक गतिविधि अथवा उत्सव अधिक बन गई है। इससे शामिल लोगों को सामूहिकता, एकजुटता, सामाजिक गौरव और अपनी शक्ति के प्रदर्शन का भी एहसास होता है सो अलग । इस यात्रा में आ चुकी तमाम बुराइयों के बावजूद मुझे लगता है कि किसी बेरोजगार अथवा अपनी काबिलियत से कमतर रोजगार में लिप्त युवा को इतना हक तो समाज को दे ही देना चाहिए कि वह साल में कुछ दिन अपने अहम की तुष्टि कर सके । कुकर का सेफ्टी वाल्व समझ कर ही इनकी खुराफातें बर्दाश्त कर ली जानी चाहिए । हां समाज चाहे तो सत्ता की ऊंची कुर्सी पर बैठे उन लोगों का गिरेबान अवश्य पकड़े जो हमारे युवाओं को काम धंधे पर लगाने की बजाय उसे कभी कुंभ आने का आह्वान करने लगते हैं तो कभी कांवड़ यात्रा को उकसाते हैं। कभी भव्य मंदिर के नाम पर फुसलाते हैं तो कभी किसी अन्य धार्मिक आयोजन में लगा देते हैं। तोड़फोड़ करने वाले कांवड़ियों से अधिक गालियां तो उनके हिस्से आनी चाहिए जो इस उत्पात के असली कारण हैं।

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