इमरजेंसी तब थी या अब है !

रवि अरोड़ा
जाने माने संपादक पद्मश्री आलोक मेहता जी के साथ लंबे अरसे तक विभिन्न अखबारों में काम किया । वे बताया करते थे कि आपातकाल के दौर में उन्होंने नवभारत टाइम्स में उत्तर प्रदेश के एक घोटाले की खबर छाप दी । प्रैस सेंसरशिप के दौर में सरकारी घोटाले की खबर छापना बड़ी हिमाकत थी सो उनके इर्दगिर्द के लोगों ने डराया कि अब आपकी गिरफ्तारी को कोई नहीं रोक सकता । आलोक जी भी चिंतित हुए मगर उन्होंने इस बाबत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर अपनी बात कहने का निर्णय लिया । उन्होंने सोचा कि जब गिरफ्तारी होनी ही है तो कम से कम अपना पक्ष तो रख ही दें । इंदिरा जी से मुलाकात हुई मगर आशंका के विपरीत उन्होंने आलोक जी का इस बात के लिए धन्यवाद किया कि यह मामला उनके संज्ञान में लाए । यही नहीं इंदिरा जी ने तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को फोन कर मामले पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश भी दे दिए । उधर, पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर कहे जाने वाले और आपातकाल के नायक स्वर्गीय कुलदीप नैयर साहब भी बताया करते थे कि इमरजेंसी के दौर में ऐसा कोई अधिकारी देश में नहीं था जो उनके साथ एक कप चाय पीने का साहस कर सके । किसी अधिकारी से वे यदि बात भी कर लेते थे तो उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाती थी । बावजूद इसके सरकार उनपर हाथ डालने से हमेशा बचती थी । एक और किस्सा , कथित तौर पर इंदिरा गांधी के ही जीवन पर बनी फिल्म आंधी से तूफान खड़ा कर देने वाले लेखक स्वर्गीय कमलेश्वर भी बताया करते थे कि कटु आलोचक होने के बावजूद स्वयं इंदिरा जी ने उन्हे बुला कर दूरदर्शन की बड़ी जिम्मेदारी यह कह कर सौंपी थी कि लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनो महत्वपूर्ण हैं ।

अब आप पूछ सकते हैं कि मैं आज इमरजेंसी कथा और इंदिरा पुराण क्यों बांच रहा हूं । दरअसल मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा । मैं तो आपको बस उस दौर की पत्रकारिता के चंद किस्से सुना रहा हूं जब देश में सचमुच इमरजेंसी और प्रैस सेंसरशिप का दौर था । ताकि आप आज के दौर में हो रहे पत्रकारों के उत्पीड़न का उस काल से तुलनात्मक अध्ययन कर सकें जब सचमुच सरकार विरोधी खबर लिखने की कानूनी मनाही थी । परीक्षा का पर्चा लीक कराने वालों की बजाय इसकी खबर छापने वाले पत्रकारों को जेल भेजने और भाजपा विधायक के खिलाफ खबर दिखाने पर पत्रकारों को थाने में नंगा करने की खबरों के बीच आपका पीछे मुड़ कर देखना बहुत जरूरी है । आपको यह जानना भी अति आवश्यक है कि हमारे मुल्क में सच्ची खबरें लिखने पर 2014 से अब तक 29 पत्रकारों की हत्या भी हो चुकी है। पत्रकारों की हत्या के मामले में अफगानिस्तान और मैक्सिको के बाद हमारा देश तीसरे नंबर पर है । यहां तक कि पाकिस्तान और सीरिया जैसे मुल्कों का रिकॉर्ड भी हमसे बेहतर है । पत्रकारों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करने और उन्हें जेल भेजे जाने का तो आंकड़ा ही कभी तैयार नहीं किया जाता । उधर ऐसी खबरें भी मिलती रहती हैं कि तलुवे चाटने वाले पत्रकार मौज काट रहे हैं । पता चलता रहता है कि फलां ने इतने करोड़ छाप लिए और फलां ने इतनी बड़ी संपत्ति इकट्ठी कर ली । अजब दौर है, जो नंगे होकर पत्रकारिता कर रहे हैं उन पर लक्ष्मी जी छप्पर फाड़ कर बरस रही हैं और जो सच्चे सरस्वती पुत्र हैं और सच्ची खबरें लिखने का साहस कर रहे हैं , उन्हें मारा जा रहा, जेल भेजा जा रहा है अथवा नंगा किया जा रहा है । यानी जो खेमे में है उसे ईनाम इकराम और जो खेमे से बाहर है उसका उत्पीड़न ? समझ ही नहीं आ रहा कि इमरजेंसी और प्रैस सेंसरशिप तब थी या अब है ?

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