आधे बावले

रवि अरोड़ा
खेती-किसानी मुझे बहुत आकर्षित करती है । यही वजह है कि मैं गाहे-बगाहे इसमें अपने हाथ जला ही बैठता हूँ । हाल ही में एक बार फिर से मोटा घाटा उठा कर मैंने दोबारा ऐसी ग़लती न करने की क़सम खाई है । दरअसल पिलखुआ आना जाना लगा ही रहता है । वहाँ मुक़ीमपुर और पवला गाँव के किसानों द्वारा की जा रही फूलों की खेती ने मुझे एक बार फिर किसानी की ओर धकेल दिया । यहाँ पिछले एक दशक से गुलाब और गेंदे के फ़ूल एक बड़े रकबे में उगाए जा रहे हैं । देखादेखी मैंने भी तीस बीघा ज़मीन पर गुलाब की पौध हाथरस से लाकर लगा दी । पूरे छः महीने इन पौधों को खाद-पानी दिया और जब फ़सल का समय आया तो एक बार फिर मेरे हाथ ख़ाली रहे ।

दरअसल फ़ूल की खपत त्योहार आदि पर ही अधिक होती है और सामान्य दिनो में इनकी कोई ख़ास पूछ नहीं होती । आप कहेंगे कि वैलेंटाइन डे के आसपास तो गुलाब की एक एक कली दस-दस रुपये में मिलती है और ब्याह शादी के दिनो तो में मामूली सा बुके भी दो ढाई सौ से कम में नहीं मिलता तथा मंदिरों में चढ़ाने के लिये गेंदे की साधारण सी माला भी बीस रुपये की मिलती है तो फिर भला ऐसे में मेरे हाथ कैसे जल गये ? तो सुनिये जनाब ! आप ग़लत फ़हमी में हैं । बाज़ार में जितनी मर्ज़ी तेज़ी हो काश्तकार का फूल नग नहीं किलो के भाव से ही बिकता है । दिल्ली एनसीआर की सबसे बड़ी ग़ाज़ीपुर की फ़ूल मंडी में गुलाब का दाम आसमान भी चढ़ा हो तो भी उसकी क़ीमत चालीस रुपये किलो तक ही जाएगी । बाज़ार मंदा हो तो दस रुपये किलो में भी उसे कोई नहीं पूछेगा । जबकि खेत से मंडी तक का भाड़ा ही बारह रुपये किलो बैठता है । बर्फ़ लगाई की लागत दो रुपये और पौधों से फ़ूल की तुड़ाई भी पाँच रुपये किलो से कम नहीं पड़ती । पौधों की देखभाल, निराई, खाद, पानी, कीटनाशक और आढ़ती के कमीशन का ख़र्च अलग से वहन करना पड़ता है ।

शुरू शुरू में तो मैं हैरान होता था कि किसान को फ़ूल की खेती पौसाती कैसे है ? फिर हिसाब लगाया कि मुझ जैसे शौक़िया किसान को तो हर काम कराने के मज़दूरों को पैसे देने पड़ते हैं जबकि किसान की श्रम शक्ति तो मुफ़्त की है । निराई घर की महिलायें कर देती हैं और खेत में पानी व दवा लगाना तथा मंडी का काम पुरुषों के ज़िम्मे है । फूलों की तुड़ाई बच्चों से बेहतर कोई कर नहीं सकता और स्कूल जाने से पहले मुँह अंधेरे ही वे यह काम निपटा देते हैं । फूलों की खेती क्या हर क़िस्म की फ़सल में अपनी श्रमशक्ति की लागत तो किसान कभी जोड़ता ही नहीं । शायद यही वजह है कि इतनी कम क़ीमत पर भी अपनी फ़सल बेच कर भी वह जीवन यापन कर लेता है और मुझ जैसे शौकीनों को श्रम शक्ति की लागत ही मार लेती है । अब ख़ाली बैठा हिसाब लगा रहा हूँ कि मोदी जी के नये कृषि क़ानून के अनुसार यदि कारपोरेट वाले कोंट्रेक्ट फ़ार्मिंग करेंगे तो उनकी लागत तो मुझ जैसों से भी अधिक पड़ेगी । आख़िर उनकी लम्बी चौड़ी प्रबंधन टीम की लागत भी तो फ़सल की क़ीमत में जुड़ेगी जबकि मैंने अपने सुपरविजन की लागत तो फ़सल में जोड़ी ही नहीं थी । इस हिसाब से तो फ़सल कोई भी हो, नई व्यवस्था में उपभोक्ता को तो ऊँची क़ीमत चुकानी ही पड़ेगी । अंबानी अडानी जैसे बड़े खिलाड़ी
ये जो सैंकड़ों एकड़ में फ़सल जमा करने के लिये गोदाम बना रहे हैं , यक़ीनन ये धर्मार्थ तो काम करेंगे नहीं । ऐसे में जींस के दाम तो शर्तिया बेतहाशा बढ़ेंगे । भगवान जाने देश की आधी से अधिक बेहद ग़रीब आबादी यह सब कैसे झेलेगी ?

सत्ता की हाँ में हाँ मिलाने वाले टीवी चैनल, अख़बार और अन्य भक्त मार्का लोग कह रहे हैं कि दिल्ली की सीमाओं पर डटे ये हज़ारों-लाखों लोग किसान नहीं हैं । मुझे भी लगता है कि ये लोग किसान नहीं हो सकते । किसान भला इतना समझदार कैसे हो सकता है कि नफ़े-नुक़सान का हिसाब लगा सके ? महाजनी हिसाब किताब तो हज़ारों साल का शोषण भी उसे नहीं सिखा सका । फिर भला ये लोग कौन हैं ? कौन हैं जो अब दो दूनी चार कर रहे हैं ? मोदी जी आप पता लगाओ कि ये लोग कौन हैं जो अपने बहाने अवाम की बात कर रहे हैं ? पता करो मोदी जी और हाँ यदि ये सचमुच किसान हों तो पंजा मत लड़ाना । ये आधे बावले भी हैं

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