अहसास ए कमतरी का नया आयाम

रवि अरोड़ा
नाम से तो आप उन्हें नहीं जानते होंगे मगर आपने सोशल मीडिया पर उनके चुटकुले अवश्य देखे सुने होंगे । उनका नाम है तरलोचन सिंह चुग और पिछले कई दशकों से वे कनाडा में अपने परिवार के साथ रहते हैं । पेशे से इंजीनियर रहे चुग साहब भारतीय रक्षा मंत्रालय में बड़े ओहदे पर थे और पिछले कई सालों से उनके चुटकुलों ने पूरी दुनिया में धूम मचा रखी है । तरलोचन सिंह की खास बात यह है कि वे पति पत्नी के रिश्ते और इसमें भी स्त्रियों के व्यवहार पर ही केवल चुटकुले सुनाते हैं । मैंने अब तक उनके जितने वीडियो देखे उन सभी में वे किसी रंगीन शाम की भरी महफिल में एक के बाद एक दसियों जोक सुना रहे होते हैं और खास बात यह होती है कि उस महफिल में महिलाओं की संख्या लगभग पुरुषों जितनी होती है तथा अपना मजाक उड़ाए जाने के बावजूद औरतें सर्वाधिक खिलखिला रही होती हैं । गौर करने योग्य बात यह है कि कोविड काल में सोशल मीडिया पर औरतों पर चुटकुलों की तादाद अचानक बढ़ गई है और खास बात यह है महिलाओं द्वारा ही उन्हें अधिक फॉरवर्ड किया जा रहा है । यह सब देखकर मुझे तरलोचन सिंह और उनकी महफिल की खिलखिलाती औरतें बहुत याद आती हैं ।

एक दौर था कि जब सिखों , पठानों, जाटों और शराबियों पर सर्वाधिक चुटकुले छोड़े जाते थे । समाज में जातीय संवेदनशीलता इतनी बढ़ गई है कि अब आसानी से किसी खास कौम अथवा जाति का मज़ाक नहीं उड़ाया जा सकता । सिक्खों के खिलाफ चुटकुले छोड़ने का मामला तो सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया था । शराब के प्रति समाज की स्वीकारोक्ति ने शराबियों को भी मज़ाक से मुक्त सा कर दिया है। शायद यही वजह रही हो कि समाज की सबसे कमजोर कड़ी मान कर औरतों को अब चुटकुलों का केंद्र बना दिया गया है । कोरोना के दौरान लम्बे लम्बे लॉक डाउन ने पुरुषों को भी घर की दहलीज में कैद कर दिया था और शायद चुटकुले बनाने वालों को नया मसाला ही मिल गया हो । हैरानी की बात यह है कि इन चुटकुलों पर स्त्रियां अधिक हंसती हैं और धड़ाधड़ आगे भेजती हैं । ये सभी चुटकुले औरतों को पुरुषों के मुक़ाबिल कमतर साबित करने वाले, उन्हें लेट लतीफ , खर्चीला, झगड़ालू और मंद बुद्धि घोषित करने वाले होते हैं मगर फिर भी स्त्रियां इनमें पूरा रस ले रही होती हैं । मैं समझने में खुद को असफल पाता हूं कि खुद की हंसी उड़वाने वाले औरतों के इस व्यवहार के पीछे उनका कौन सा मनोविज्ञान है ? इस पितृ सत्तात्मक समाज में क्या उन्होंने खुद को दोयम दर्जे का नागरिक स्वीकार कर लिया है ? क्या स्वेच्छा से वे ऐसा करती हैं अथवा इसके पीछे कोई सामाजिक, आर्थिक अथवा मनोवैज्ञानिक दबाव काम कर रहा होता है ? क्या वाकई वे खुद पर हंस रही होती हैं अथवा अपने इर्द गिर्द के पुरुषों को हंसाने के लिए अपने अहम की बलि चढ़ा रही होती हैं ? क्या यह उनकी कोरी भावुकता है या पुरुष के वर्चस्व के प्रति उनकी स्वीकारोक्ति ? क्या उन्होंने स्त्रियों को मनोरंजन की कोई शय मानने की प्रवृत्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है अथवा समाज की रूढ़िवादी सोच से विद्रोह उन्हें अब अपने बूते से बाहर लगता है ? मैं यह समझने में कतई असफल हूं कि लैंगिग समानता की बात करने वाली आधुनिक महिलाएं भी इन चुटकुलों का पात्र खुद को क्यों माने बैठी है ?

हो सकता है कि औरतें के लिए खुद पर हंसना उनके मनोरंजन का ही कोई माध्यम हो । यह भी संभव है कि दूसरों के मनोरंजन से उन्हें खुशी मिलती हो । यह भी हो सकता है कि संवाद का उनका यह कोई तरीका हो अथवा इसके बहाने से वे अपने संबंध प्रगाढ़ करती हों । मगर मनोवैज्ञानिक तो कहते हैं कि जिन चुटकुलों पर हम हंसते हैं दरअसल अपनी निजी जिंदगी में हम वैसा ही सोचते रहे होते हैं । यदि ऐसा है तो कहीं ये चुटकुले हमारी औरतों के अहसास ए कमतरी का कोई नया आयाम तो नहीं ?

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