असत्य के प्रयोग

रवि अरोड़ा
एक पुराना क़िस्सा है कि सूखे से दुःखी एक गाँव के लोगों ने इंद्रदेव को प्रसन्न करने को यज्ञ का आयोजन किया । यज्ञ स्थल पर जमा हुई सैकड़ों लोगों की भीड़ में एक बालक एसा भी था जो वहाँ छाता लेकर आया था । इस पर पुरोहित ने कहा कि केवल यही बालक इस यज्ञ का अधिकारी है क्योंकि इसे विश्वास है कि यज्ञ से वर्षा होगी और शेष भीड़ पूर्णत पाखण्डी है । कोरोना संकट के इस काल में अब उन कर्मकांडियों की भी पोल खुलती जा रही है जो धर्म के नाम ही सत्ता में आए और इस संकट में उन्होंने सबसे पहले धार्मिक स्थल ही बंद करवाये । हैरत तो इस बात पर है कि शराब की दुकानें सबसे पहले खोलने वालों को अपने पूजा स्थलों के ताले खुलवाने की याद अभी तक नहीं आई । स्पष्ट है कि इनके बड़े बड़े तिलक, जनेयु , भगवा वस्त्र और तमाम अन्य प्रपंच केवल दिखावे के हैं और राजनीतिक हथियार के तौर पर वे इनका इस्तेमाल करते हैं । चलो अच्छा है किसी भी वजह से सही मगर इन्होंने विज्ञान को धर्म पर प्राथमिकता तो दी । क़ौज़ एंड इफ़ेक्ट की थ्योरी को माना तो सही वरना मंदिर-मस्जिद के नाम पर हमेशा इन्होंने विज्ञान का रास्ता ही रोका है और हमें आपस में लड़ाया है।
ज़माने से सुनते आये हैं कि ईश्वर वहीं है जहाँ ग़रीबी है , अमीरों को तो ईश्वर की ज़रूरत ही नहीं है । समृद्ध देशों में धर्म की अनुपस्थिति इसकी गवाही भी देती दिखती है । कोरोना संकट ने एक तरह से यह भी साबित कर दिया कि ज्ञानी-ध्यानी लोग धार्मिक स्थलों की भूमिका बढ़ा-चढ़ा कर ही प्रस्तुत करते हैं । लॉक़डाउन के चलते दो महीने से अधिक हो गए लोगों को पूजा स्थल गए हुए मगर उनका जीवन फिर भी यथावत चल रहा है । शमशान घाट के प्रबंधक पंडित मनीष आचार्य बता रहे हैं कि पूर्णत लॉक़डाउन में लोगों की मृत्यु दर आधी रह गई थी और अब लॉक़डाउन में रियायतों के बाद जाकर घाट पर शवों का आँकड़ा बढ़ा है । हैरानी की बात यह है कि उन दिनो तमाम बड़े अस्पतालों में कोरोना के अतिरिक अन्य बीमारियों के मरीज़ों को भर्ती नहीं किया जा रहा था और अधिकतर प्राइवेट डाक्टरों के क्लीनिक भी बंद थे । यानि साफ़ हवा पानी से ही बीमारियाँ और मृत्यु दर कम हो गई । बिना मंदिर गए ही लोगों को क़ुदरत ने अच्छा स्वास्थ्य और लम्बी उम्र दे दी । इन आँकड़ों से तो नास्तिकों का यह आरोप भी अब वज़नी हो चला है कि धार्मिक स्थल और कुछ नहीं बल्कि बिज़नस मौडयूल भर हैं । अब तो सरकार भी नास्तिकों के साथ खड़ी नज़र आती है वरना संकट काल में प्रार्थना हेतु चौबीस घंटे धार्मिक स्थल खोलने का आदेश देती। संकट के समय में जब भक्त को भगवान की सबसे अधिक ज़रूरत है , उस समय ही भगवान को भला क़ैद क्यों करती ?
मुझे नहीं पता कि मैं कितना आस्तिक हूँ अथवा कितना नास्तिक मगर मुझे इस बात का पक्का यक़ीन है कि या तो ईश्वर हमारा सृजक़ नहीं है और यदि है तो वह हमारे छोटे-बड़े किसी भी काम में दख़ल नहीं देता । उसने प्रकृति में ग्रेवीटी जैसे अनेक नियम बना दिये हैं और हमारा भाग्य उन नियमों के भरोसे ही छोड़ दिया है। स्वर्ग-नर्क अथवा कर्म-भाग्य यह सब नैतिकता के क्षेत्र के औज़ार हैं । दूसरी बात यह कि यदि ईश्वर है तो एसा कैसे हो सकता है कि हिंदू को वह कोई बात बताये और मुस्लिम-ईसाई को कुछ और कथा सुनाये ? आख़िर हमसे छुपता क्यों फिर रहा है वह ? हमारे पैदा होते ही हमे उसके अस्तित्व का ज्ञान क्यों नहीं होता ? कहीं तमाम धर्म आदीवासी सभ्यता के वाहक तो नहीं हैं जो अब तक हमसे चिपटे हुए हैं ? सीधी सी बात है कि जीवन की बस में हम सभी सवार हैं । एसे कैसे हो सकता है कि हिंदू को खिड़की से बाहर झरने और पहाड़ दिख रहे हैं और मुसलमान को रेगिस्तान अथवा खुला आकाश ? लाखों साल के क्रमिक विकास ने हमें आज का इंसान बनाया जो वैज्ञानिक कसौटी रखता है । क्या यह उचित है इस इंसान को उसी सत्य के नाम पर आपस में लड़ाया-भिड़ाया जाये जो अभी तक अज्ञात है ? क़सम से मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा है यह देख कर कि मंदिर की राजनीति करने वाले एक छोटे से वायरस से डर कर सबसे पहले अपने मंदिर छोड़ कर भागे ।

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