अवसादी चौराहे

रवि अरोड़ा

शास्त्री नगर चौक पर जैसे ही कार रुकी , एक बच्ची दौड़ती हुई आई और कार के बंद शीशे को खटखटा कर कुछ भीख देने का इशारा करने लगी । मैं हैरान था कि अभी पाँच सेकेंड पहले ही तो मैंने उसे अपने अन्य साथियों के साथ मस्ती करते देखा था और अब इसके चेहरे पर लाचारी के भाव अचानक कैसे आ गए ? असूलन मैं एसे बच्चों को भीख नहीं देता अतः मुँह फेर लिया । मेरे इंकार का इशारा समझ वह बच्ची तुरंत पीछे वाली कार के पास गई और वहाँ से भी कुछ न मिलने पर वापिस अपने ठीए यानि सड़क के डिवाइडर पर लौट गई । उसके साथ के अन्य भिखारी बच्चे भी तब तक अपने-अपने ग्राहक निबटा कर आ गए थे और फिर वे सभी हँसते हुए अपने उसी खेल में लग गए , जिसे बीच में छोड़ कर वे लाल बत्ती पर रुकी गाड़ियों से अभी अभी भीख माँग रहे थे । खेल में मशगूल हुए भिखारी बच्चों के चेहरे पर ख़ुशी देख कर मैं हैरत में था । आस पास खड़ी कारों और स्कूटर-मोटर साईकिल सवार लोगों के भाव जानने को जब उनकी ओर देखा तो और हैरानी हुई कि मेरे अतिरिक्त अन्य किसी ने भी इस कौतुक को देखने में समय बर्बाद नहीं किया था । हर कोई अपनी ही दुनिया में खोया नज़र आया । कोई बार बार घड़ी देख रहा है तो कोई अकारण होर्न बजाये जा रहा है । कोई आगे वाले को ज़बरन अपने रास्ते से हटाने का चक्रव्यूह रच रहा है तो कोई आँखों आँखों में पड़ौसी कार वाले को धमका रहा है कि हरी लाइट होते ही पहले मैं निकलूँगा । जिसकी भी ओर देखा , वही दुःखी आत्मा नज़र आया । रोचक बात यह थी कि कोई किसी से बात नहीं कर रहा और किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट का नामोनिशान नहीं । डेड़ मिनट की इस मुलाक़ात में यदि कोई हँसता मिला तो वे केवल भिखारी बच्चे ही थे ।

ग्रीन लाइट हुई मगर चौराहा पार करने के बाद भी मैं अपनी दुनिया में नहीं लौट सका । एक सवाल चिपट सा गया था कि जिनके पास कुछ नहीं है वे भिखारी बच्चे ख़ुश क्यों थे और जिनके पास सब कुछ है वे दुःखी क्यों नज़र आये ? क्या संसाधनों का ख़ुशी से बिलकुल भी लेना-देना नहीं है ? घर , वाहन , अच्छे कपड़े-लत्ते और बेहतरीन भोजन और ख़ुशहाल परिवार क्या हमें इतनी शक्ति भी नहीं दे पा रहा कि हम कभी कभार बिला वजह भी मुस्कुरा सकें ? क्या वाक़ई इन बच्चे की ख़ुशी का कारण उनका बचपन है और हम बड़ों की परेशानी का सबब है हमारा बड़ा होना ? क्या हम सब काम के बोझ के मारे हैं या अपनी महत्वाकांक्षाओं के ? आख़िर गड़बड़ क्या है हमारे साथ ?

कार आगे बढ़ी तो हाल ही में नज़रों से गुज़रे विश्व स्वास्थ्य संघटन यानि डब्ल्यूएचओ के आँकड़े याद आने लगे। उसके अनुसार भारत के लोगों के दिमाग़ पर सबसे अधिक बोझ होता है और यही कारण है कि दुनिया भर के मुक़ाबले भारत में अवसाद का रोग सबसे ज़्यादा है । उसकी ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि हमारे साढ़े छः फ़ीसदी नागरिक डिप्रेशन में हैं । हमारे यहाँ आत्महत्या का ग्राफ़ एक लाख में 21 तक पहुँच गया है और एसा करने वाले अधिकांश लोगों की उम्र 44 साल से कम है । कारपोरेट दुनिया में काम कर रहे हमारे 42 फ़ीसदी युवा डिप्रेशन के शिकार हैं । हर पाँचवे भारतीय को काउन्सलिंग की ज़रूरत है तथा देश के 36 भारतीय डिप्रेशन के किनारे पर खड़े हैं । 39 परसेंट लोगों को काम की वजह से छः घंटे भी नींद नहीं मिलती और साल 2005 से 2015 में ही अवसाद के केस 45 फ़ीसदी बढ़ गए हैं । रोज़ाना 371 भारतीय आत्महत्या कर रहे हैं और इनमे सभी आय , धर्म , लिंग , उम्र और व्यवसाय के लोग शामिल हैं । रिपोर्ट यह भी कहती है कि 18 साल से 29 साल तक की उम्र वालों की मौत का सबसे बड़ा कारण हमारे यहाँ आत्महत्या ही है । आँकड़े और भी बहुत हैं और दुर्भाग्य से सभी एक से बढ़ कर डरावने हैं ।

अब बात डब्ल्यूएचओ के सर्वे की हो या मेरी आपकी आँखों देखी , बात तो यही है कि हम लोग ख़ुश रहना भूलते जा रहे हैं । इसी रौशनी में सवाल भी उठ रहे हैं कि तमाम धार्मिक गतिविधियाँ , तमाम तीज-त्यौहार, सार्वजनिक आयोजन और मेले-उत्सव भी अब हमें ख़ुश क्यों नहीं रख पा रहे ? जिस विकास के नाम का राग हर कोई अलाप रहा है क्या उसको ख़ुशी से भी जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिये ? क्या हमें कभी समझ आएगा कि हमें अन्य मामलों के साथ साथ और कमोवेश सबसे पहले विश्व की हेप्पीनेस इंडेक्स में अपना कोई सम्मानजनक स्थान बनाना चाहिये ? जिस कारपोरेट दुनिया को हम ललचाई नज़रों से देख रहे हैं , उसकी तड़क-भड़क आख़िर कैसे हमसे हमको ही कैसे छीने ले रही है? मन ही मन सवाल गुँथ रहा हूँ कि अरे इसी बीच एक और चौराहा आ गया है । चलिये मेरी बात अब यहीं ख़त्म , मैं पहले सामने खड़े इस भिखारी बच्चे से निपट लूँ ।

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