अनाड़ विद्या

रवि अरोड़ा

मुझे यक़ीन है कि वह घिसा-पिटा चुटकुला आपने भी ज़रूर सुना होगा जिसमें एक भैंस व्यापारी अपने ग्राहक को भैंसों के दाम बता रहा है । पाँच किलो दूध देने वाली भैंस का दाम पाँच हज़ार और दस किलो दूध रोज़ देने वाली का दस हज़ार । इसी तरह बीस किलो दूध देने वाली भैंस का दाम बीस हज़ार मगर एक किलो भी दूध न देने वाली एक मोहक सी भैंस का रेट वह पचास हज़ार बताता है । इस पर जब ग्राहक कारण पूछता है तो विक्रेता बताता है कि यह भैंस बहुत चरित्रवान है और यह दाम उसके चरित्र का है । अब आप कहेंगे कि मैं यह चुटकुला आपको क्यों सुना रहा हूँ । दरअसल पहले मैंने सोचा था कि भक्त गणों की तरह मैं भी कश्मीर , पाकिस्तान और तीन तलाक़ पर कुछ आएँ-बाएँ लिखूँ और काम ख़त्म करूँ मगर जब रह रह कर ज़ेहन में देश के आर्थिक हालात की ख़बरें कौंधने लगीं और यह चुटकुला याद आने लगा तो इरादा बदल दिया । वैसे आप ही बताइये , यही कुछ नहीं हो रहा है अपने मुल्क के साथ ? चरित्र का भाव इतना चढ़ गया कि कोई यह देख ही नहीं रहा कि भैंस दूध भी दे रही है कि नहीं ।

अजब विडम्बना है । जिन्हें अर्थ तंत्र सम्भालना आता है , वे बेईमान हैं और अपनी जेबें पहले भरते हैं और जो कथित रूप से ईमानदार हैं उनके हाथों सब चौपट हुआ जा रहा है । बेशक हर आठ दस सालों में दुनिया भर में विकास का अर्थचक्र पूरा हो जाता है और फिर मंदी का प्रभाव झेलना पड़ता है । मगर भारत जैसे देश अलग राह पर ही चलते हैं । वर्ष 2008 की मंदी जो अमेरिका से शुरू हुई और भारत में भी इसका असर हुआ था मगर फिर भी हमारे कदम लड़खड़ाये नहीं । यहाँ तक कि जीडीपी पर भी इसका प्रभाव कोई ख़ास नहीं पड़ा और केवल दो सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था मज़बूती के चरम पर पहुँच गई । इसका श्रेय बेशक कोई तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियों को न दे मगर दुनिया भर के अर्थशास्त्री तो उनका लोहा मानते ही हैं । इस बार जो मंदी की छाया भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिख रही है , उसके कारण अंतराष्ट्रीय कम स्थानीय अधिक हैं और काफ़ी हद तक हमारी बेवक़ूफ़ियों का ही नतीजा हैं । आटो , रियल एस्टेट , टेलीकोम , बैंकिंग , स्टील और टेक्सटाइल जैसे उद्योगों में भयंकर मंदी है और रोज़ हज़ारों नौकरियाँ जा रही हैं । बिस्कुट और कच्छे तक नहीं बिक रहे और उनसे जुड़े उद्योगों में भी धड़ाधड़ छटनी हो रही है । सरकारी संस्थान नेशनल सैंपल सर्वे ओफिस ने ख़ुद माना है कि देश में पिछले 45 सालों में सबसे अधिक बेरोज़गारी इस समय है । देश में बेरोज़गारी का सरकारी आँकड़ा 6 .1 है जबकि शहरों में यह 7.8 फ़ीसदी है । बीते वित्त वर्ष में विकास दर 6.8 थी जोकि पिछले पाँच सालों में सबसे कम है । इस साल का अनुमान भी अच्छा नहीं है । हालात का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि सोने का आयात 5.3 परसेंट इस साल कम हो गया है जबकि पिछले साल यह 6.3 फ़ीसदी ज़्यादा था ।

जानकर बता रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था नोटबंदी और बिना तैयारी के जीएसटी लागू करने के कारण पहले ही चौपट थी उस पर सरकार के सुधार कार्यक्रमों से बाज़ार पर उल्टा प्रभाव पड़ा और टेक्सटाइल जैसा क्षेत्र जो देश में दस करोड़ लोगों को रोज़गार देता है वह भी 34.6 फ़ीसदी नीचे आकर धराशायी हो गया । हैरत की बात यह है कि गाय, मंदिर , कश्मीर और पाकिस्तान में ही देश को उलझाए हुए मीडिया ने जब उसके हालात पर मुल्क का ध्यान आकर्षित नहीं किया तो उन्होंने बड़े बड़े विज्ञापन देकर छपवाया कि हम मर रहे हैं हमें बचा लो । देश में डिमांड और सप्लाई का अंतर इस क़दर बढ़ गया है कि कारों के शोरूम धड़ाधड़ बंद हो रहे हैं और आटो सेक्टर 31 परसेंट तक नीचे आ गया है । रियल सेक्टर की हालत इतने से ही समझ आ रही है कि बारह बड़े शहरों में तेरह लाख मकान बने खड़े हैं और उनका कोई ख़रीदार नहीं है । रुपये की क़ीमत लगातार कम हो रही है । शेयर बाज़ार नीचे आ रहा है । निवेश कम से कमतर हो चला है और विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार कमज़ोर हो रहा है । उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी खुलेआम कह रहे हैं कि हालात गम्भीर हैं और बड़ा संकट सिर पर है मगर केंद्र की मोदी सरकार फिर भी यूँ मस्त दिख रही कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं । कोढ़ में खाज़ यह है कि सरकार की अनाड़ विद्या से बेशक मुल्क का अर्थ तंत्र हिचकोले खा रहा है मगर हम और आप हैं कि फिर भी दूध-दाद भूल कर भैंस के चरित्र पर ही रीझे जा रहे हैं । वाक़ई धन्य हैं हम ।

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