अख़बारों का मर्सिया

रवि अरोड़ा
घर में कई अख़बार आते हैं मगर मेरे बच्चे अख़बार नहीं पढ़ते । हालाँकि दुनिया जहान की ख़बर उन्हें मुझसे ज़्यादा रहती है । जब पूछो कि तुम्हें यह सब कैसे पता तो जवाब मिलेगा- नेट से । मेरे बच्चे ही नहीं मेरे रिश्तेदारों और मित्रों के बच्चों का भी यही हाल है । न जाने क्यों नई पीढ़ी अख़बार से दूरी बना कर चलती है । रही सही कसर अब कोरोना संकट ने पूरी कर दी है । संक्रमण के भय से लोग बाग़ अख़बार नहीं ख़रीद रहे । बड़ी बड़ी सोसायटीज ने भीतर अख़बार आने पर प्रतिबंध लगा रहा है । चौराहों और बाज़ारों में तो ख़ैर अख़बारों की फ़ुटकर बिक्री का सवाल ही नहीं । नतीजा समाचार पत्रों का सर्कुलेशन औंधे मुँह ज़मीन पर आ गया है । आर्थिक संकट के चलते निजी क्षेत्र के ही नहीं सरकारी विज्ञापन भी ख़त्म सिमट रहे हैं और आर्थिक तंगी के नाम पर पत्रकारों की धड़ाधड़ नौकरियाँ जा रही हैं । बेशक कभी न कभी महामारी का यह संकट भी ख़त्म होगा मगर इसके साथ बदली हमारी जीवन शैली में भी क्या अख़बारों की जगह होगी , यह सवाल मौजू हो चला है ।
कोरोना काल से पूर्व की बात करें तो पूरी दुनिया में अख़बारों का अवसान प्रारम्भ हो चुका था । डिजिटल मीडिया धीरे धीरे अख़बारों की जगह लेने लग गया था मगर भारत में फिर भी प्रिंट मीडिया सालाना पाँच फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा था । इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार संकट से पूर्व भारत में अख़बारों की प्रतिदिन बिक्री साढ़े बयालिस करोड़ थी । हालाँकि यह आँकड़ा वह है जो आरएनआई को सवा लाख से अधिक अख़बारों ने अपने सर्कुलेशन में दर्शाया है । चूँकि विज्ञापन की दरें सर्कुलेशन से जुड़ी होती हैं अतः तमाम अख़बार अपनी प्रसार संख्या बढ़ा चढ़ा कर ही दर्शाते हैं । इस आँकड़े के अनुरूप तो चार सदस्यों वाले देश के प्रत्येक परिवार में एक से अधिक अख़बार की ख़रीद होनी चाहिये । ज़ाहिर है देश की एक तिहाई आबादी के पास जब दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं है और देश की सम्पूर्ण साक्षरता दर भी 74 फ़ीसदी ही है तो अख़बारों की प्रसार संख्या इतनी कैसे हो सकती है ?
दरअसल लघु और मझोले अख़बार ही नहीं देश के जाने माने तमाम बड़े अख़बार भी प्रसार संख्या में खेल करते हैं और प्रिंटिंग प्रेस से अख़बार सीधा रद्दी बाज़ार पहुँच जाता है । ख़ैर आँकड़ों से इतर ज़मीनी हक़ीक़त देखें तो भी इस समय अख़बारों का प्रसार ज़मीन पर है । देश के एक बड़े अख़बार के प्रसार विभाग से जुड़े अधिकारी की मानें तो कोरोना संकट के बाद अख़बारों का प्रसार मात्र बीस फ़ीसदी रह गया है । अपनी मौजूदगी बनाये रखने के लिए सभी प्रकाशक अपने ऑन लाइन एडिशन निकाल रहे हैं और पे वॉल बंद कर अपना अख़बार पाठकों को मुफ़्त उपलब्ध करवा रहे हैं । छोटे अख़बार भी अपनी पीडीएफ फ़ाइल को प्रसारित कर बता रहे हैं कि अभी हम मरे नहीं हैं । अनेक अख़बारों ने अपने वट्सएप संस्करण भी निकाले हुए हैं । उधर, बिक्री बंद होते ही छोटे ही नहीं बड़े अख़बारों ने भी पत्रकारों की छँटनी शुरू कर दी है । प्रसार और छपाई से जुड़ा आधे से अधिक स्टाफ़ तो पहले झटके में ही घर बैठा दिया गया था । बड़े बड़े अख़बारों ने भी अपने पेज कम कर दिए हैं और हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया जैसे दिग्गज समूह भी इस मामले में किसी क़स्बे के अख़बार जैसा व्यवहार कर रहे हैं । हालात यह हो चले हैं कि लघु और मझोले अख़बारों में कई महीने से वेतन नहीं बँट पा रहा तो बड़े समूह तीस से चालीस फ़ीसदी कटौती की बात कर रहे हैं ।
कुल मिला कर सवाल यह है कि क्या अख़बार अब हमारी ज़िंदगी से विदा लेने वाले हैं ? स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख हथियार, आज़ादी के बाद जागरूकता के सबसे बड़े औज़ार एवं देश में बौद्धिकता की अलख जगाए वाले सबसे बड़े सिपाही की विदाई का क्या समय आ गया है ? क्या वाक़ई अब हमें अपने प्रिय अख़बारों का मर्सिया पढ़ना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि हे अख़बारों अब आराम करो सन 1780 से लेकर 2020 तक आपने हमारी बहुत सेवा कर ली ?

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