अकेला नहीं है कोरोना

रवि अरोड़ा
सयाने कहते हैं कि मुसीबत अकेली नहीं आती । कोरोना संकट में भी कुछ यही हो रहा है । हालाँकि दो ढाई महीने शांति रही मगर लॉकडाउन में रियायत मिलने के साथ ही क्षेत्र में अपराध और आत्महत्या की घटनाओं में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है । आपने भी ग़ौर किया होगा कि अख़बार एसी ख़बरों से रोज़ ही भरे होते हैं । लॉकडाउन के दौरान सत्तर फ़ीसदी अपराध कम हो गए थे । पुलिस रिकार्ड के अनुसार जो अपराध हुए वे भी केवल आपसी रंजिश अथवा सामाजिक कारणों के थे । अप्रेल और मई माह में चोरी, डकैती, लूट और अपहरण की वारदातें थम सी गई थीं मगर मध्य जून के बाद से तो अपराधी जैसे अगली पिछली सारी कसर ही पूरी कर रहे हैं । बीती रात तो अपराधियों के बढ़ते हौसले का चरम ही दिखाई दिया । कानपुर में दबिश देने गई पुलिस टीम पर बदमाशों ने अंधाधुंध गोलियां चला कर सर्कल ऑफिसर और 3 सब इंस्पेक्टर समेत 8 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया । इस वारदात से प्रदेश पुलिस के क़ानून व्यवस्था सम्बंधी तमाम दावों की पोल ही खुल गई है ।
कोरोना ने बेशक पूरी दुनिया के प्राण सुखा रखे हैं मगर उसका यह सकारात्मक असर तो हुआ ही था कि अन्य लोगों की तरह अपराधी भी लॉकडाउन में घरों में क़ैद थे । सक्रिय थे तो केवल साइबर अपराधी । इस दौरान साइबर अपराधों में कई गुना वृद्धि हुई है । कोरोना से डरे लोगों के लिए कम्प्यूटर पर न जाने कितने ठग काँटा डाल कर आजकल बैठे हैं । वे हमारी कमज़ोर नस जानते हैं और किसी न किसी तरीक़े से हमसे एक अनजान लिंक क्लिक करवा लेते हैं और उसके बाद हमारी तमाम निजी जानकारियाँ ही नहीं बैंक में जमा हमारी गाढ़ी कमाई भी उनकी हो जाती है । वे लोग गूगल और फ़ेसबुक के प्रतिनिधि बन कर भी हमारी निजी जानकारियाँ हम से उगलवा लेते हैं ।
लॉकडाउन के दिनो में हर कोई समय व्यतीत करने को इंटरनेट पर था और लोगों की नेट पर इसी सक्रियता का लाभ उठाकर उन्हें ठगी का शिकार बनाया गया । डरे लोग कोरोना से जुड़ी जानकारी पाने को भी नेट पर जाते हैं और वहाँ भी ठग कोरोना सम्बंधी डोमेन सज़ा कर बैठे मिलते हैं । कोरोना शब्द से जुड़े एक लाख से अधिक डोमेन पिछले तीन चार महीने में रजिस्टर्ड हुए हैं । अब उनमे से कितने ठग हैं कहा नहीं जा सकता । उधर भारत का आईटी एक्ट भी साइबर ठगों का उत्साहवर्धन करने का काम करता नज़र आता है । हालाँकि एक्ट की धारा 43 / 66 के तहत अपराधी को तीन साल की सज़ा हो सकती है मगर तमाम पेचीदगियों के चलते पुलिस इस धारा में मुक़दमा दर्ज ही नहीं करती और यदि हो भी जाये तो आधुनिक शिक्षा के अभाव में पुलिस कर्मी सबूत ही नहीं जुटा पाते । अब इस लॉकडाउन व अनलॉक में कितने लोगों के साथ साइबर ठगी हुई है अथवा प्रतिदिन कितनो के साथ हो रही है यह कहा भी नहीं जा सकता ।
उधर लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों के समक्ष जो आर्थिक संकट खड़ा हुआ है उसने बड़ी आबादी के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डाला है । बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाओं के पीछे यही कारण है । डब्ल्यूएचओ ने हाल ही में इसकी चेतावनी भी दी है । लॉकडाउन के दिनो मे तो लोगबाग चिंता, अवसाद, ग़ुस्सा, दुःख, और बेचैनी में प्रतिदिन आत्मघाती कदम उठा ही रहे थे मगर अनलॉक के दिनो में तो जैसे निराशा और बढ़ गई है । डब्ल्यूएचओ की मानें तो एक आत्महत्या के साथ बीस अन्य लोगों के असफल प्रयास भी होते हैं । स्थिति कितनी भयावय है इसका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है । यूँ भी भारत दुनिया में आत्महत्याओं में पहले से ही सबसे आगे है । दुनिया भर में सालाना लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं और उनमे से दो लाख लोग अकेले भारत के होते हैं । अब आप स्वयं हिसाब लगाइये कि कोरोना संकट अकेला आया है या उसका पूरा परिवार ही साथ है ?

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